August 4th, 2007

फनकार

Posted in Anirudh, Hindi, Poems by Anirudh

उधर वो कूड़े के ढेर में खाना

यूँ ढूँढ रही थी
इधर वो हैरानी कागज़ से कलम पर
यूँ घिसे जा रहा था
उसकी भूख से शायद इसकी कलम का पेट

यूँ भर रहा था
मेरी मुहँबोली बहन कहा करती है
फनकार आम आदमियों में शरीक नही होते
उनसे कहीँ बढकर होते हैं
शायद….

 

सच ही कहा करती है..

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